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नारीजाति की तरंगे-2

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नारीजाति की तरंगे-        मेरे चित्रों की एक प्रदर्शनी ‘नारीजाति की तरंगे’ शीर्षक से ललित कला अकादमी, रवीन्द्र भवन की कलादीर्घा 7 व 8 में 19 मार्च 2011 तक लगी। जिसमें महिलाओं की दशा दिशा पर मेरे तैलीय (आयल) एक्रेलिक, जलारंगीय (वाटर कलर) एवं रेखांकनों के चित्र प्रदर्षित हुए.                  इस चित्र प्रदर्शनी में नारीजाति की तरंगे विषय को केन्द्र में रखकर चित्रों का चयन करके उन्हें प्रदर्शित किया गया है जिनमें भारतीय नारीजाति की विविध आयामी स्वरूपों का दृश्याकंन किया गया है जिनमें-यह दिखाने का प्रयत्न किया गया है जिनमें जिस रूप में स्त्रियां जन्म से लेकर अब तक आकर्शित, प्रभावित और उत्प्रेरित करती आयी हैं परंतु इनकी अपनी व्यथा है जो पढ़ना बहुत ही सरल होता है. आप मान सकते हैं कि मैं पुरुषों को उतनी आसानी से नहीं पढ़ पाता हूं । मैने बेशक स्त्रियों को ही अपने चित्रों में प्रमुख रुप से चित्रित किया है, क्योकि मुझे नारी सृजन की सरलतम उपस्थिति के रूप में परिलक्षित होती रहती है कहीं कहंी के फुहड़पन को छोड़ दं...

मूर्तियां

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अनेकों मूर्ति अलग-अलग माध्यमों में बनाई गई है। 

नारीजाति की तरंगे

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                मेरे चित्रों की एक प्रदर्शनी ‘नारीजाति की तरंगे’ शीर्षक से ललित कला अकादमी, रवीन्द्र भवन की कलादीर्घा 7 व 8 में 19 मार्च 2011 तक लगी। जिसमें महिलाओं की दशा दिशा पर मेरे तैलीय (आयल) एक्रेलिक, जलारंगीय (वाटर कलर) एवं रेखांकनों के चित्र प्रदर्षित हुए.                  इस चित्र प्रदर्शनी में नारीजाति की तरंगे विषय को केन्द्र में रखकर चित्रों का चयन करके उन्हें प्रदर्शित किया गया है जिनमें भारतीय नारीजाति की विविध आयामी स्वरूपों का दृश्याकंन किया गया है जिनमें-यह दिखाने का प्रयत्न किया गया है जिनमें जिस रूप में स्त्रियां जन्म से लेकर अब तक आकर्शित, प्रभावित और उत्प्रेरित करती आयी हैं परंतु इनकी अपनी व्यथा है जो पढ़ना बहुत ही सरल होता है. आप मान सकते हैं कि मैं पुरुषों को उतनी आसानी से नहीं पढ़ पाता हूं । मैने बेशक स्त्रियों को ही अपने चित्रों में प्रमुख रुप से चित्रित किया है, क्योकि मुझे नारी सृजन की सरलतम उपस्थिति के रूप में परिलक्षित होती रहती है कहीं कहंी के फुह...

वर्तमान में महिला सशक्तिकरण और शैक्षिक संवर्धन

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वर्तमान में महिला सशक्तिकरण और शैक्षिक संवर्धन (राष्ट्रीय सेमिनार-राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय कांधला,मुज़फ्फरनगर )  महिलाओं की व्यापक सहभागिता और सांस्कृतिक संवर्धन - डॉ.लाल रत्नाकर   भारत में सदियों से सामाजिक स्तर पर विविध प्रकार का युद्ध चल रहा है जहाँ महिला, दलित और पिछड़े समान रूप से उससे प्रभावित हो रहे हैं, यहीं इनकी कुछेक संख्या को अलग कर उन्हें धोखे में रख शोषण की  चालाकी से उनकी प्रतिभाओं की स्तुति करके बहुसंख्य से बाँट करके बहुत ही करीने से अपमानजनक अवस्थाओं में खड़ा करके यशस्वी होने का जो भ्रम उत्पन्न किये हुए है, उससे एहसास होता है की भारत आज भी 'मनुस्मृति' की जकड की जटिल मान्यताओं के आधार पर ही चल रहा है. आज दुर्गा,लक्ष्मी और सरस्वती, शक्ति, धन और ज्ञान की देवी के रूप में पूज्य हैं, इनकी प्रतीतात्मकता का पूरा शोषण पूंजी और धार्मिक धर्माधिकारियो के द्वारा किया जाता है. जबकि पूरी स्त्री जाती उन्ही के द्वारा नित्य अपमानित होती है. और यहीं से शुरू होती है वह जंग. यही कारण है कि भारत कि महिलाओं को भी भारतीय समाज की तरह बाँटकर...

जो आधी आवादी के समीकरण को गड़बड़ा रहा है।

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डॉ.लाल रत्नाकर  जो कुछ बचा है उसे सहेजना होगा, क्योंकि गाँव भी तेजी से बदल रहे हैं, यहाँ  जमीनें कम हो रही हैं लोग ऊपर आ रहे हैं, शानों शौकत में, रहन सहन में, वर्ताव में शहरीपन आ रहा है या कह लें संकुचित सोच और चालाकी, कुटिलता, जिस कदर बढ़ रही है उसकी तुलना क्या हम उस दौर के उन लोगों से कर सकते हैं, क्या उनको भूल चुके हैं। ओ सादगी जो कभी दादी माँ में थी विलुप्त होती जा रही है. अपने पराये का भेद बहुत तेजी से बढ़ रहा है 'बसुधेव कुटुम्बकम' तो दूर परिवारों में दुराव आ रहा है. यहाँ का मूल तत्व सहयोग जो  समाप्त होता जा रहा है, भाईचारा गए जमाने की बात हो गया है, भाई भाई को फूटी आँखों नहीं देखना चाहता है, अडोस पड़ोस तो खाने दौड़ रहे हैं, गाँव देश अब कहने को रह गया है. रीतिरिवाज़ - जिस कदर बदल रहे हैं उससे लगता है आधी आवादी ही नहीं ये तो पूरी आवादी बदल रही है,सवाल है की क्या यह बदलाव वाजिब है, बिलकुल वाजिब लगता है लड़कियाँ कालेज जाती हैं लडके आज भी ज्यादा तो निक्कम्मों की तोहमत  संभाले हुए हैं . पर ये आधी आवादी की वजाय ...

In Gallery Jehangir Art Mumbai

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Jehangir Art Gallery Mumbai

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