जो आधी आवादी के समीकरण को गड़बड़ा रहा है।

डॉ.लाल रत्नाकर 


जो कुछ बचा है उसे सहेजना होगा,
क्योंकि गाँव भी तेजी से बदल रहे हैं, यहाँ  जमीनें कम हो रही हैं लोग ऊपर आ रहे हैं, शानों शौकत में, रहन सहन में, वर्ताव में शहरीपन आ रहा है या कह लें संकुचित सोच और चालाकी, कुटिलता, जिस कदर बढ़ रही है उसकी तुलना क्या हम उस दौर के उन लोगों से कर सकते हैं, क्या उनको भूल चुके हैं। ओ सादगी जो कभी दादी माँ में थी विलुप्त होती जा रही है. अपने पराये का भेद बहुत तेजी से बढ़ रहा है 'बसुधेव कुटुम्बकम' तो दूर परिवारों में दुराव आ रहा है. यहाँ का मूल तत्व सहयोग जो  समाप्त होता जा रहा है, भाईचारा गए जमाने की बात हो गया है, भाई भाई को फूटी आँखों नहीं देखना चाहता है, अडोस पड़ोस तो खाने दौड़ रहे हैं, गाँव देश अब कहने को रह गया है.
रीतिरिवाज़ -
जिस कदर बदल रहे हैं उससे लगता है आधी आवादी ही नहीं ये तो पूरी आवादी बदल रही है,सवाल है की क्या यह बदलाव वाजिब है, बिलकुल वाजिब लगता है लड़कियाँ कालेज जाती हैं लडके आज भी ज्यादा तो निक्कम्मों की तोहमत  संभाले हुए हैं . पर ये आधी आवादी की वजाय  एक अजीबो गरीब समीकरण है जो आधी आवादी के फार्मूले को हिला के रख रहा है छः लड़कियों के बाद एक  लड़का जो हो सकता है हरियाणा से भिन्न हो, पश्चिमी उ . प्र . से  भी भिन्न हो पर यह  जो आधी आवादी के समीकरण को गड़बड़ा रहा है। 
आज के जमाने में पुराने इतिहास को यादकर यदि जीना चाहते हैं तो भूल जाईए यदि आप चाहते हैं की जातियता फैलाने से काम चल जाएगा, तो ऐसा लगता नहीं है।
समझदारी का ठेका संम्भाले आज के नेता लगभग अपने कुटुम्बिओं के आगे अवनत हो चुके हैं, जो अब अपने इर्द गिर्द के अच्छे बुरे का फर्क भी समाप्त कर चुके हैं। इनसे किसी तरह की अपेक्षा करना अपने को धोखा देना मात्र ही रह गया है।

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